जवाहरलाल नेहरू
(Jawaharlal Nehru)
पंडित जवाहरलाल
नेहरू (जन्म: 14 नवम्बर, 1889; मृत्यु: 27 मई, 1964) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के
महान् सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री (1947-1964) थे। जवाहर लाल
नेहरू, संसदीय सरकार की स्थापना और विदेशी मामलों में 'गुटनिरपेक्ष' नीतियों के लिए विख्यात हुए। 1930 और
1940 के दशक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से वह एक थे।
जन्म एवं शिक्षा
नेहरू कश्मीरी
ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक
क्षमताओं तथा विद्वत्ता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में
इलाहाबाद आ गये थे। इनका जन्म इलाहाबाद में 14 नवम्बर 1889 ई. को हुआ। वे पं.
मोतीलाल नेहरू और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे। अपने सभी भाई-बहनों
में, जिनमें दो बहनें थीं, जवाहरलाल
सबसे बड़े थे। उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली
महिला अध्यक्ष बनीं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई 14 वर्ष की आयु में
नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज़ अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की।
इनमें से सिर्फ़ एक, फ़र्डिनैंड ब्रुक्स का, जो आधे आयरिश और आधे बेल्जियन अध्यात्मज्ञानी थे, उन
पर कुछ प्रभाव पड़ा। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिन्दी और संस्कृत पढ़ाते थे। 15 वर्ष की उम्र में 1905 में
नेहरू एक अग्रणी अंग्रेज़ी विद्यालय इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल में भेजे गये। हैरो
में दाख़िल हुए, जहाँ वह दो वर्ष तक रहे। नेहरू का शिक्षा
काल किसी तरह से असाधारण नहीं था। और हैरो से वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए,
जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक
उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और
वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर
उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और उनके अपने ही शब्दों में परीक्षा उत्तीर्ण करने में
उन्हें 'न कीर्ति, न अपकीर्ति' मिली।
परिवार
मार्च 1916 में
नेहरू का विवाह कमला कौल के साथ हुआ, जो दिल्ली में बसे कश्मीरी परिवार की थीं। उनकी अकेली संतान इंदिरा
प्रियदर्शिनी का जन्म 1917 में हुआ; बाद में वह, विवाहोपरांत नाम 'इंदिरा गांधी', भारत की प्रधानमंत्री बनीं तथा एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी थी। 1912 ई. में वे बैरिस्टर बने और उसी
वर्ष भारत लौटकर उन्होंने इलाहाबाद में वकालत प्रारम्भ की। वकालत में उनकी विशेष
रुचि न थी और शीघ्र ही वे भारतीय राजनीति में भाग लेने लगे। 1912 ई. में उन्होंने
बाँकीपुर (बिहार) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में
प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।
राजनीति
भारत लौटने के
बाद नेहरू ने पहले वकील के रूप में स्थापित होने का प्रयास किया लेकिन अपने पिता
के विपरीत उनकी इस पेशे में कोई ख़ास रुची नहीं थी और उन्हें वकालत और वकीलों का
साथ, दोनों ही नापसंद थे। उस समय वह अपनी पीढ़ी के कई अन्य
लोगों की भांति भीतर से एक ऐसे राष्ट्रवादी थे, जो अपने देश
की आज़ादी के लिए बेताब हो, लेकिन अपने अधिकांश समकालीनों की
तरह उसे हासिल करने की ठोस योजनाएं न बना पाया हो।
गाँधी जी से मुलाकात
1916 ई. के लखनऊ
अधिवेशन में वे सर्वप्रथम महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आये। गांधी उनसे 20 साल
बड़े थे। दोनों में से किसी ने भी आरंभ में एक-दूसरे को बहुत प्रभावित नहीं किया।
बहरहाल, 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का
अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे।
इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा की
गई। उससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की माँग था।
चाचा नेहरू
देशभर में
जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन '14 नवंबर' बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे
और यही कारण था कि उन्हें प्यार से चाचा नेहरू बुलाया जाता था। एक बार चाचा नेहरू
से मिलने एक सज्जन आए। बातचीत के दौरान उन्होंने नेहरू जी से पूछा, "पंडित जी, आप सत्तर साल के हो गये हैं, लेकिन फिर भी हमेशा बच्चों की तरह तरोताज़ा दिखते हैं, जबकि आपसे छोटा होते हुए भी मैं बूढ़ा दिखता हूँ।" नेहरू जी ने
मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "इसके तीन कारण हैं। मैं
बच्चों को बहुत प्यार करता हूँ। उनके साथ खेलने की कोशिश करता हूँ, इससे मैं अपने आपको उनको जैसा ही महसूस करता हूँ। मैं प्रकृति प्रेमी हूँ,
और पेड़-पौधों, पक्षी, पहाड़,
नदी, झरनों, चाँद,
सितारों से बहुत प्यार करता हूँ। मैं इनके साथ में जीता हूँ,
जिससे यह मुझे तरोताज़ा रखते हैं।
अधिकांश लोग
सदैव छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं और उसके बारे में सोच-सोचकर दिमाग़ ख़राब
करते हैं। मेरा नज़रिया अलग है और मुझ पर छोटी-छोटी बातों का कोई असर नहीं
होता।" यह कहकर नेहरू जी बच्चों की तरह खिलखिलाकर हंस पड़े।
स्वतंत्रता में योगदान
जवाहरलाल नेहरू
महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़े। चाहे असहयोग
आंदोलन की बात हो या फिर नमक सत्याग्रह या फिर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बात
हो उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। मलिक ने बताया कि
नेहरू की विश्व के बारे में जानकारी से गांधी जी काफ़ी प्रभावित थे और इसीलिए
आज़ादी के बाद वह उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे। सन् 1920 में
उन्होंने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में पहले किसान मार्च का आयोजन किया।
1923 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए।
आज़ाद भारत में नेहरू
ब्रिटिश संसदीय
प्रणाली को आधार मान कर बनाए गए भारतीय संविधान के तहत हुआ यह पहला चुनाव था
जिसमें जनता ने मतदान के अधिकार का प्रयोग किया। इस चुनाव के समय मतदाताओं की कुल
संख्या 17 करोड़ 60 लाख थी जिनमें से 15 फ़ीसदी साक्षर थे। 1952 में पहले आमचुनाव
हुए जिसमें कांग्रेस पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और पंडित जवाहरलाल नेहरू
भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वह 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से
अंतरिम प्रधानमंत्री थे। संसद की 497 सीटों के साथ-साथ राज्यों कि विधानसभाओं के
लिए भी चुनाव हुए। लेकिन जहाँ संसद में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ
वहीं कुछ राज्यों में इसे दूसरे दलों से ज़बर्दस्त टक्कर मिली। कांग्रेस पार्टी
बहुमत हासिल करने में इस शहरों चेन्नई, हैदराबाद और त्रावणकोर में विफल रही जहाँ उसे कम्युनिस्ट पार्टी ने कड़ी
टक्कर दी। हालाँकि इन चुनावों में हिन्दू महासभा और अलगाववादी सिक्ख अकाली पार्टी
को मुँह की खानी पड़ी। पहले चुनाव के बाद से ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया
(सीपीआई) ने दक्षिणी राज्यों में जनसमर्थन बढ़ाना शुरू कर दिया जिसके नतीजे 1957
में हुए चुनाव में उसे मिले। त्रावणकोर-कोचिन और मालाबार को मिला कर बने केरल में
कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई।
प्रधानमंत्री के रूप में
1929 में जब
लाहौर अधिवेशन में गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था, तब से 35 वर्षों तक- 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर
रहते हुए मृत्यु तक, 1962 में चीन से हारने के बावजूद,
नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे। राजनीति के प्रति उनका
धर्मनिरपेक्ष रवैया गांधी के धार्मिक और पारंपरिक दृष्टिकोण से भिन्न था। गांधी के
विचारों ने उनके जीवनकाल में भारतीय राजनीति को भ्रामक रूप से एक धार्मिक स्वरूप
दे दिया था। गांधी धार्मिक रुढ़िवादी प्रतीत होते थे, किन्तु
वस्तुतः वह सामाजिक उदारवादी थे, जो हिन्दू धर्म को
धर्मनिरपेक्ष बनाने की चेष्ठा कर रहे थे। गांधी और नेहरू के बीच असली विरोध धर्म
के प्रति उनके रवैये के कारण नहीं, बल्कि सभ्यता के प्रति
रवैये के कारण था। जहाँ नेहरु लगातार आधुनिक संदर्भ में बात करते थे। वहीं गांधी
प्राचीन भारत के गौरव पर बल देते थे।
देश के इतिहास
में एक ऐसा मौक़ा भी आया था, जब महात्मा गांधी को
स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल
नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त और बागी तेवर के सामने
नेहरू का विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा और वह न सिर्फ़ इस पद पर चुने गए,
बल्कि उन्हें सबसे लंबे समय तक विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की
बागडोर संभालने का गौरव हासिल भी हुआ।
हिन्दुस्तान एक
ख़ूबसूरत औरत नहीं है। नंगे किसान हिन्दुस्तान हैं। वे न तो ख़ूबसूरत हैं, न देखने में अच्छे हैं- क्योंकि ग़रीबी अच्छी चीज़
नहीं है, वह बुरी चीज़ है। इसलिए जब आप 'भारतमाता' की जय कहते हैं- तो याद रखिए कि भारत क्या
है, और भारत के लोग निहायत बुरी हालत में हैं- चाहे वे किसान
हों, मज़दूर हों, खुदरा माल बेचने वाले
दूकानदार हों, और चाहे हमारे कुछ नौजवान हों।
बतौर लेखक
पंडित नेहरू एक
महान् राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, ख्याति प्राप्त लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा 1936 ई. में प्रकाशित हुई और
संसार के सभी देशों में उसका आदर हुआ। उनकी अन्य रचनाओं में भारत और विश्व,
सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता और उसके बाद विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें से
अन्तिम दो पुस्तकें उनके फुटकर लेखों और भाषणों के संग्रह हैं।
प्रकाशित पुस्तकें
पिता के पत्र : पुत्री के नाम - 1929
विश्व इतिहास की झलक (ग्लिंप्सेज ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री) - (दो खंडों में) 1933
मेरी कहानी (ऐन ऑटो बायोग्राफी) - 1936
भारत की खोज/हिन्दुस्तान की कहानी (दि डिस्कवरी ऑफ इंडिया) - 1945
राजनीति से दूर
इतिहास के महापुरुष
राष्ट्रपिता
जवाहरलाल नेहरू वाङ्मय (11 खंडों में)
नेहरूजी के प्रेरक प्रसंग
बात उस समय की
है जब जवाहर लाल नेहरू किशोर अवस्था के थे। पिता मोतीलाल नेहरू उन दिनों अंग्रेजों
से भारत को आज़ाद कराने की मुहिम में शामिल थे। इसका असर बालक जवाहर पर भी पड़ा।
मोतीलाल ने पिंजरे में तोता पाल रखा था। एक दिन जवाहर ने तोते को पिंजरे से आज़ाद
कर दिया। मोतीलाल को तोता बहुत प्रिय था। उसकी देखभ ाल एक नौकर करता था। नौकर ने
यह बात मोतीलाल को बता दी। मोतीलाल ने जवाहर से पूछा, 'तुमने तोता क्यों उड़ा दिया। जवाहर ने कहा, 'पिताजी पूरे देश की जनता आज़ादी चाह रहीं है। तोता भी आज़ादी चाह रहा था,
सो मैंने उसे आज़ाद कर दिया।' मोतीलाल जवाहर
का मुंह देखते रह गये।
वैज्ञानिक प्रगति के प्रेरणा स्रोत
गांधी जी के
विचारों के प्रतिकूल जवाहरलाल नेहरू ने देश में औद्योगीकरण को महत्व देते हुए भारी
उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया। विज्ञान के विकास के लिए 1947 ई. में
नेहरू ने 'भारतीय विज्ञान कांग्रेस' की स्थापना की। उन्होंने कई बार 'भारतीय विज्ञान
कांग्रेस' के अध्यक्ष पद से भाषण दिया। भारत के विभिन्न
भागों में स्थापित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनेक केंद्र इस
क्षेत्र में उनकी दूरदर्शिता के स्पष्ट प्रतीक हैं। खेलों में नेहरू की व्यक्तिगत
रुचि थी। उन्होंने खेलों को मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए आवश्यक
बताया। एक देश का दूसरे देश से मधुर सम्बन्ध क़ायम करने के लिए 1951 ई. में
उन्होंने दिल्ली में प्रथम एशियाई खेलों का आयोजन करवाया। समाजवादी विचारधारा से
प्रभावित नेहरू ने भारत में लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना का लक्ष्य रखा। उन्होंने
आर्थिक योजना की आवश्यकता पर बल दिया। वे 1938 ई. में कांग्रेस द्वारा नियोजित 'राष्ट्रीय योजना समिति' के अध्यक्ष भी थे।
स्वतंत्रता पश्चात् वे 'राष्ट्रीय योजना आयोग' के प्रधान बने। नेहरू जी ने साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए
धर्मनिरपेक्षता पर बल दिया। उनके व्यक्तिगत प्रयास से ही भारत को एक धर्मनिरपेक्ष
राष्ट्र घोषित किया गया था।
जवाहरलाल नेहरू
ने भारत को तत्कालीन विश्व की दो महान् शक्तियों का पिछलग्गू न बनाकर तटस्थता की
नीति का पालन किया। नेहरूजी ने निर्गुटता एवं पंचशील जैसे सिद्धान्तों का पालन कर
विश्व बन्धुत्व एवं विश्वशांति को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, जातिवाद एवं
उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ जीवनपर्यन्त संघर्ष किया। अपने क़ैदी जीवन में जवाहरलाल
नेहरू ने 'डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया', 'ग्लिम्पसेज
ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री' एवं 'मेरी कहानी'
नामक ख्यातिप्राप्त पुस्तकों की रचना की।
मृत्यु
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